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क्या भारत हिन्दू राष्ट्र बनने की राह पर है !


क्या भारत हिन्दू राष्ट्र बनने की राह पर है !

      भारत में 2019 के पार्लियामेंट्री चुनाव में हज़ार कयासों के बीच आखिर भारतीय जनता पार्टी NDA ने भारी बहुमत से जीत हासिल की और सत्ता में दुबारा वापस आई । भारतीय जनता पार्टी के बारे में माना जाता है कि यह हिन्दूवादी पार्टी है और हार्ड कोर हिन्दुत्व की राजनीति करती है। भारत के बहुसंख्य जनता को विश्वास है कि BJP ही है जो भारत को विश्वगुरु बना सकती है और ससम्मान भारत को दुनिया के आर्थिक पटल पर आगे अग्रसर कर सकती है । साथ ही साथ बहुसंख्य जनता का यह भी मानना है कि भारत को हिन्दू राष्ट्र भारतीय जनता पार्टी ही बना सकती है और इन बातों पर बल मिलता है सुब्रह्मण्यम स्वामी, साक्षी महाराज और साध्वी प्रज्ञा जैसे नेताओं के वक्तव्य से ।
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   *तो क्या भारत के संवैधानिक व्यवस्था में हिन्दू राष्ट्र घोषित हो पाना संभव है ?   *और जब भारत विभाजन हुआ तो पाकिस्तान की तरह भारत को हिन्दू राष्ट्र        घोषित क्यों नहीं किया गया ?

      तुर्कों, मंगोलों (मुग़लो), अंग्रेज़ों आदि आक्रांताओं की गुलामी के चंगुल से जब भारत लगभग 800 साल बाद 1947 में जब स्वतंत्र हुआ तब तक भारत वर्ष की डेमोग्राफी, सामाजिक व्यवस्था, भूगोल, इतिहास सब कुछ बदल चुका था। भारत में अरब से लाया गया इस्लाम धर्म पूर्णतया जड़ जमा चुका था, या यूं कहें कि भारत की मिट्टी में इस्लाम घुल-मिल चुका था । 800 साल, एक बहुत लंबा अंतराल होता है, इस दौरान कई राजा-शहंशाह गुजरे जो अपने अपने विचार और नियम-कानून से भारत पर राज किए। कुछ हिन्दू राजाओं की गद्दारी और नाकामियों की वजह से इस्लाम परस्त शहँशाह देश में इस्लाम की जड़ों को और मजबूत करते रहे और लाखों हिंदुओं का धर्म परिवर्तन करा के गजवा-ए-हिन्द को अंजाम देते रहे। आज हिंदुस्तान में ज़्यादातर मुसलमान ऐसे हैं जिनके पूर्वजों ने या तो दबाव मे आकार या जान और इज्ज़त जाने के डर से इस्लाम कुबूल कर लिया था; इसलिए मैं आज के मुसलमानों को उतना दोषी नहीं मानता जितना दोषी मैं तत्कालीन हिन्दू राजाओं को मानता हूँ जो उस वक्त अपने धर्म और प्रजा की रक्षा नहीं कर पाये; तो अब जब सैकड़ों साल बीत चुके हैं जिन्होने इस्लाम या अन्य धर्म कुबूल कर लिया है उनसे यह नहीं कह सकते की तुम घर वापसी कर लो, अपना धर्म और धार्मिक सिद्धान्त का पालन करना छोड़ दो और सनातन धर्म अपना लो । पुरातन काल में सनातन धर्म में एक बहुत बड़ी त्रुटि थी, उस वक्त हिन्दू धर्म से जाने का दरवाजा तो था परंतु वापस आने का कोई दरवाजा नहीं था, तो उस वक्त चाह कर भी हिन्दू धर्म में वापस नहीं आया जा सकता था। और अब जब हिन्दू धर्म बहुत हद तक लचीला हो गया है तो कई पीढ़ियाँ अपने धर्म में गुज़ार चुके जनता को घर वापसी के लिए नहीं बोल सकते ।   

1947 में ईस्ट इंडिया कंपनी की लंदन वापसी के साथ सभी तरह के सामंतवाद और राजशाही से भारत को मुक्ति मिल गई और आक्रांताओं की गुलामी से भी मुक्ति मिल गई। जब देश आज़ाद हुआ उस वक्त हिन्दू बहुसंख्यक थे परंतु मुसलमान भी इतनी तादाद में थे कि उन्हें अल्पसंख्यक तो कतई नहीं कहा जा सकता था । अंग्रेज़ों द्वारा लाई गई फूट करो और राज करो की राजनीति इतनी हावी थी कि आज़ादी मिलने के  बाद हिन्दू-मुस्लिम अपनी गंगा जमुनी तहजीब भूल कर एक दूसरे के खून के प्यासे बन बैठे थे । मोहम्मद अली जिन्नाह और मुस्लिम लीग जैसी पार्टियां अलग मुस्लिम राष्ट्र की मांग कर रहे थे, तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियाँ और राजनेताओं की महत्वकांक्षाएँ, मजबूरीयों के सामने यह मांग मानने के अलावा कोई चारा नहीं था । फलस्वरूप भारत वर्ष को दो टुकड़ों में विभाजित कर दिया गया, एक बना इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान बना और दूसरा बना धर्मनिरपेक्ष हिंदुस्तान (भारत)। सही मायने में 1947 में भारत के तीन टुकड़े हुये थे एक पूर्वी पाकिस्तान भी बनाया गया था जो 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर इस्लामिक रिपब्लिक बांग्लादेश बना।

      पाकिस्तान इस्लामिक रिपब्लिक के तौर पर स्थापित हुआ और हिंदुस्तान को एक सेक्युलर मुल्क बनाया गया क्योंकि उस वक्त बहुत सारे मुसलमान भारत में ही रह गए थे, इसके अलावा सिक्ख, फारसी, जैन, बौद्ध आदि कई और भी धर्म के लोग थे जिनके लिए भारत सुरक्षित शेल्टर बना। जिन मुसलमानों को अपना वतन और मिट्टी से ज़्यादा लगाव था वो अपनी संपति-मकान छोडकर पाकिस्तान नहीं गए और इसी देश को अपना वतन मान लिया । चूंकि भारत एक सेक्युलर मुल्क बना था इसलिए यहाँ के लोगों को अपना-अपना धर्म आज़ादी से जीने और प्रचार-प्रसार का संवैधानिक अधिकार दिया गया। उधर सरहद पार पाकिस्तान इस्लामिक देश के तौर पर फलता फूलता रहा। विभाजन के बाद काफी तादाद में हिन्दू और सिक्ख पाकिस्तान में रह गए थे जिनकी जीने की आज़ादी का रखवाला कोई नहीं बना, फलस्वरूप पाकिस्तान में गैर मुस्लिम लगातार घटने लगे; आज पाकिस्तान में हिंदुओं की जनसंख्या मात्र 1.6% रह गई है जबकि आज़ादी के वक्त सरहद पार हिन्दू आबादी 15% के आसपास थी। दूसरी तरफ भारत एक सेक्युलर मुल्क के तौर पर फलता फूलता रहा लेकिन किसी ने यहाँ की डेमोग्राफी पर ध्यान नहीं दिया, आजादी के बाद से ही काँग्रेस लगातार सत्ता में रही परंतु उनका झुकाव अल्पसंख्यको की राजनीति में ज़्यादा थी। वह तुष्टीकरण करके 70 सालों तक सत्ता में काबिज रही, परंतु बहुसंख्यक वर्ग की समस्याओं की तरफ किसी सरकारों ने ध्यान नहीं दिया ।

      800 साल के बाद जब देश स्वतंत्र हुआ था तो बहुसंख्यक हिंदुओं के मन में कई तरह की तकलीफ़ें समस्याएँ, रंज-व-ग़ुस्सा था, जिसका निदान वो चाहते थे; जिसकी तरफ किसी सरकारों ने (बीजेपी को छोडकर) ध्यान नहीं दिया। मुग़ल काल में हिंदुओं के सैकड़ों मंदिर, मठ और गुरुकुल, विश्वविद्यालय ध्वस्त कर दिये गए और उनपर मस्जिद बना दी गई थी, उनको वापस पाना हिंदुओं के जुनून में शामिल था लेकिन सरकारों ने कभी भी बहुसंख्यक भावनाओं को नहीं समझा । परिणाम स्वरूप हिंदुवादी संगठनो की कुंठा बढ़ती गई और RSS तथा बजरंग दल जैसे संगठनो ने अपनी ताकत दिखानी शुरू कर दी । 1992 में बाबरी ढांचा के Demolition के बाद लंबे अर्सों के इंतज़ार के बाद 1999 में पहली बार भारतीय जनता पार्टी (NDA) की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी और अटल बिहारी बाजपेयी प्रधान मंत्री बने जिन्होने हिन्दू अस्मिता को समझा। लेकिन 2004 में जनता ने फिर से शाइनिंग इंडिया का नारा देने वाले बाजपेयी सरकार को नकार दिया और फिर से काँग्रेस 10 वर्षों तक मनमोहन सिंह के नेतृत्व में देश की सत्ता में काबिज रही। हिंदुओं की समस्याएँ वहीं की वहीं धरी रह गई, राम जन्म भूमि का मामला फिर से अटक गया। 2004 से 2014 तक काँग्रेस सत्ता में रही लेकिन सरकार जनता का विश्वास फिर से खो बैठी और 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी NDA के साथ मिलकर भारी बहुमत से सत्ता में वापस आई।


      पाँच साल की हुकूमत में प्रधानमंत्री मोदी ने कई ऐसे निर्णय लिए जिसने देश को चौका दिया; ऐसा बताया जाने लगा कि भारत के ब्यापरी और मिडिल क्लास वर्ग मोदी सरकार से नाखुश हैं, बीजेपी से देश के मुसलमान तो पहले से नाराज थे इसलिए कयास लगाया जाने लगा था कि  2019 की आम चुनाव में मोदी सरकार सत्ता में वापस नहीं आएगी। लेकिन हुआ बिलकुल उल्टा प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी तथा एन डी ए ने सबका साथ सबका विकास और हिन्दुत्व के एजेंडे पर चुनाव लड़ा और इस बार और भी भारी बहुमत से सरकार सत्ता में आई । बहुसंख्यक वर्ग को विश्वास हो गया की तुष्टीकरण की विपक्षी राजनीति के बावजूद हिदुत्व और राष्ट्रियता के एजेंडे पर चुनाव लड़ा जा सकता है और जीता भी जा सकता है । अब चुनकर आए हुये सांसदों को भी ये यकीन हो गया कि बहुसंख्यक वर्ग की आकांक्षाओं को समझे बिना अब देश में चुनाव जीता नहीं जा सका और उसका प्रभाव इस बार देश भर से चुनकर आए सांसदों के ऊपर दिखा। पहली बार जब देश की नई संसद में नए सदस्य शपथ ग्रहण कर रहे थे तो एक अनोखा दृश्य देखने को मिला जो यह पुष्टि करता है कि भारत अब हिन्दू राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है, पहली बार संसद में सदस्य गण अपने अपने देवी देवताओं की जयकार किया जो भारत की धर्मनिरपेक्ष ब्यवस्था के बिलकुल विपरीत था । जय श्री राम, जय माँ काली, हर हर महादेव के नारों से संसद गूंज उठा, वैसे अल्लाह-हु-अकबर का नारा भी बुलंद हुआ परंतु उनकी संख्या बहुत कम थी। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या भारत हिन्दू राष्ट्र बनने की ओर अग्रसर है ? मेरे ख्याल से यह शुरुआत हो सकती है। भारत हिन्दू राष्ट्र बने या न बने परंतु जिस धर्मनिरपेक्ष संसद में लोग हिन्दू शब्द कहने से भी घबराते थे आज वहाँ हिन्दू देवी देवताओं के नारे लगाए जा रहे हैं । इससे  हिन्दू अस्मिता को बल ज़रूर मिल रहा है और बहुत हद तक हिन्दुत्व की राजनीति करने वाले संतुष्ट हैं ।
धन्यवाद,
Jharokha India by Manoj Kumar


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