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भारत में आए ईश निंदा क़ानून


भारत में आए ईश निंदा क़ानून


भारत में आक्रांताओं द्वारा मंदिर में हमला और मूर्तियों को खंडित करके धन संपदा को लूट ले जाना शदियों से चलता आ रहा है। ग़ज़नवी, ग़ौरी, औरंगज़ेब, बाबर आदि आक्रांताओं का एजेंडा था भारत के मंदिरों को तोड़ो, लूटो और हिंदुओं को डरा-धमका कर इस्लाम क़ुबूल करवाओ। ऐसे सैकड़ो उदाहरण अभी भी आंखों के सामने मौजूद है जहां पहले मंदिर थे जिसे तोड़कर मस्जिद बना दिया गया, मंदिर का खजाना लूटकर शहंशाह अपना खज़ाना भरते रहे। चाहे सोमनाथ मंदिर हो, पद्मनाभ स्वामी मंदिर या काशी सब जगह कई उदाहरण मौजूद है कि कैसे और किस एजेंडा के तहत आक्रांताओं ने हिंदुओं को लूटा उनका दमन किया उनके धार्मिक स्थलों पर कब्ज़ा किया। 

सैकड़ो सालों से देश ग़ुलाम था, सरकारें-हुक़ूमतें हमेशा से रही परंतु भारत में लोकतंत्र इन सालों में नहीं रहा था, हिन्दू हमेशा से मैजोरिटी में रहे परंतु उनकी आवाज़ को हथियार के बल पर दबा दिया जाता रहा। तुर्को, मुग़लो और फिर अंग्रेजों के हाथों रौंदा जाता रहा परंतु कोई रोकने वाला नहीं था परंतु अब तो भारत आज़ाद हो चुका है देश में चुनी हुई सरकार है फिर भी हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान, हिंदुओं पर दमन बदस्तूर जारी है, क्या इसी को आज़ादी कहते हैं?

दिल्ली के चांदनी चौक में सैकड़ो दंगाइयों द्वारा मंदिर में हमला करना, देवी-देवताओं की मूर्तियों को तोड़ना, मंदिर में गंदगी फेंक कर भाग जाना;  ऐसे कई उदाहरण है जो देश की सरकार और लोकतंत्र को शर्मसार कर रहा है। सरकार को चाहिए कि इस तरह की घटनाओं को संजीदगी से ले और अभी संसद का सत्र भी चल रहा है जिसमें ऐसा कानून पारित हो जिसमें प्रावधान हो कि जो कोई भी धार्मिक स्थल पर हमला करेगा, ईश निंदा करेगा उसे फांसी से भी कड़ी सजा दी जाए। अगर अब इस आज़ाद हिंदुस्तान में सिविल यूनिकोड और ईश निंदा पर क़ानून नहीं बनेगा तो वो दिन दूर नहीं जब भारत के एक वर्ग में पनप रही कुंठा भयंकर रूप ले लेगी और फिर बहुत देर हो चुकी होगी, सरकारों के बस में नागरिकों को संभालना नहीं रहेगा।

भारत से अलग हुए देश पाकिस्तान और बांग्लादेश में देखिए! धार्मिक स्थलों पर एक कंकड़ भी कोई फेंक दे तो फांसी दे दी जाती है, ईश निंदा कानून के तहत अब तक असंख्य लोगों को सज़ा दी जा चुकी है परंतु भारत में ही ऐसा क्यों है कि यहाँ हिन्दू देवी-देवताओं को गाली दो या गंदी तस्वीरें बनाओ, मंदिर तोड़ो, खुलेआम भारत का झंडा जलाओ, गौ हत्या करो परंतु सेक्युलरिज्म के नाम पर उदारवादी गैंग बाहर आ जाते है और गुंडों को सज़ा दिलाने को छोड़कर बचाने में लग जाते हैं, धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देकर एक वर्ग को बहलाने-फुसलाने की कोशिश की जाने लगती, हैं गिरफ़्तारियों के नाम पर कुछ लोगों को रिमांड पर लिया जाता है और फिर सबूतों के अभाव में छोड़ दिया जाता है, जबकि होना चाहिए था कि ऐसे आक्रान्ताओं को सरेआम बीच चौराहे पर फांसी की सज़ा दी जाती ताकि कोई हमलावर गुंडा दुबारा ईश निंदा से पहले हज़ारों बार सोचे। ऐसे आक्रांताओं के ज़ेहन में प्रशाशन का डर इस क़दर होना चाहिए कि इस तरह के कुकृत्य करने से पहले हज़ार बार सोचें। अभी कानून इतना लचीला है कि सज़ा हो नहीं पाती कोर्ट का प्रक्रिया इतनी लंबी होती है कि लोग उस केस को भूल चुके होते हैं।

हिंदुस्तान की एक सच्चाई है कि इस देश में हिन्दू-मुस्लिम-सिख्ख-इशाई सब को एक साथ रहना ही है ऐसे में कुछ फिरकापरस्तों द्वारा फैलाई जा रही नफ़रत को सरकार के सहयोग से मिटाना ही होगा वरना निर्दोष जनता पिसती आई है, पिसती रहेगी।  

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